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  جاينية · جَايْنِيَّة · جَيْنِيَّة · يانية · الجاينية

جاينية أحد الديانات الدارمية ذات الطابع الفلسفي نشأت في الهند القديمة تبعا لتعاليم ماهافيرا. Wikipedia

    •     bn:00047894n     •     NOUN     •     Concept    •     Updated on 2019/07/22     •     Categories: 印度宗教, 各种宗教宗派及运动, 耆那教

  耆那教 · 尼干子派 · 尼犍外道 · 尼犍子 · 裸行外道

耆那教(梵语:जैनधर्म Jainadharma;泰米尔语:சமணம் Samaṇam;英语:Jainism),是起源于古印度的古老宗教之一,有其独立的信仰和哲学。 Wikipedia

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  Jainism   · jain dharma · jaina · Jaini · Jainy

Religion founded in the 6th century BC as a revolt against Hinduism; emphasizes asceticism and immortality and transmigration of the soul; denies existence of a perfect or supreme being WordNet

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Jainism, traditionally known as Jain Dharma is an ancient Indian religion. Wikipedia
Lesya is a metaphysical concept used to describe the aura of the soul, usually listed as one of six colorations. Wikipedia (disambiguation)
Religion originating in India Wikidata
A follower of Jainism, a religion based primarily in India. Wiktionary
An ancient Dharmic religioncomuna francesaon nonviolence departamento de Corrèzeelevate the reincarnating soul towards moksha by liberating it from samsara. Wiktionary
Jainism / ˈdʒeɪnɪz m /, traditionally known as Jaina dharma, is an Indian religion which prescribes paths of Ahiṃsā, or nonviolence towards all living beings, and which emphasizes a spiritual interdependence of all forms of life. Wikiquote

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  jaïnisme · jinisme · djaïnisme · jainisme · Mahavrata

Le jaïnisme ou jinisme est une religion qui aurait probablement commencé à apparaître vers le Xe ou IXe siècle av. J.-C.. Wikipedia

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Religion indienne Wikidata

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    •     bn:00047894n     •     NOUN     •     Concept    •     Updated on 2019/07/22     •     Categories: Einzelreligion, Frieden, Gewaltfreiheit, Jainismus

  Jainismus · Dschaina · Dschainismus · Dschinismus · Jainas

Der Jainismus, auch Jinismus, ist eine in Indien beheimatete Religion, die etwa im 6./5. Wikipedia

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In Indien beheimatete Religion Wikidata

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    •     bn:00047894n     •     NOUN     •     Concept    •     Updated on 2019/07/22     •     Categories: Θρησκευτικές πίστεις, παραδόσεις και κινήματα, Τζαϊνισμός

  Τζαϊνισμός · Ζαϊνισμός

O Τζαϊνισμός ή Ζαϊνισμός αποτελεί θρησκεία που προέρχεται από την Ινδία και ιδρυτής της φέρεται ο Κύριος Ρισάμπα, το όνομα του οποίου αναφέρεται στις Βέδες και θεωρείται από ορισμένους Ινδουιστές ως μία από τις εικοσιτέσσερις ενσαρκώσεις του θεού Βισνού. Wikipedia

    •     bn:00047894n     •     NOUN     •     Concept    •     Updated on 2019/07/22     •     Categories: אי-אלימות, דתות, צמחונות, קטגוריה

  ג'ייניזם · ג'איניזם · ג'יניזם

הג'ייניזם היא דת הודית שהתפתחה במאה השישית לפנה"ס, באותה מאה בה נוסד הבודהיזם. Wikipedia

    •     bn:00047894n     •     NOUN     •     Concept    •     Updated on 2019/07/22     •     Categories: जैन धर्म, भारत के धर्म, भारत में जैन धर्म, भारत में धर्म

  जैन धर्म · गुजरात में जैन धर्म · जैन · Dharma (जैन धर्म) · Moksa (जैन धर्म)

जैन धर्म भारत के प्राचीन धर्म में से एक है। 'जैन धर्म' का अर्थ है - 'जिन द्वारा प्रवर्तित धर्म'। जो 'जिन' के अनुयायी हों उन्हें 'जैन' कहते हैं। 'जिन' शब्द बना है 'जि' धातु से। 'जि' माने - जीतना। 'जिन' माने जीतने वाला। जिन्होंने अपने मन को जीत लिया, अपनी वाणी को जीत लिया और अपनी काया को जीत लिया और विशिष्ट ज्ञान को पाकर सर्वज्ञ या पूर्णज्ञान प्राप्त किया उन आप्त पुरुष को जिनेश्वर या 'जिन' कहा जाता है'। जैन धर्म अर्थात 'जिन' भगवान्‌ का धर्मअहिंसा जैन धर्म का मूल सिद्धान्त है। जैन दर्शन में सृष्टिकर्ता कण कण स्वतंत्र है इस सॄष्टि का या किसी जीव का कोई कर्ता धर्ता नही है।सभी जीव अपने अपने कर्मों का फल भोगते है।जैन धर्म के ईश्वर कर्ता नही भोगता नही वो तो जो है सो है।जैन धर्म मे ईश्वरसृष्टिकर्ता इश्वर को स्थान नहीं दिया गया है।जैन ग्रंथों के अनुसार इस काल के प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव आदिनाथ द्वारा जैन धर्म का प्रादुर्भाव हुआ था। जैन धर्म की अत्यंत प्राचीनता करने वाले अनेक उल्लेख अ-जैन साहित्य और विशेषकर वैदिक साहित्य में प्रचुर मात्रा में हैं। == भगवान == जैन ईश्वर को मानते हैं जो सर्व शक्तिशाली त्रिलोक का ज्ञाता द्रष्टा है पर त्रिलोक का कर्ता नही | जैन धर्म में जिन या अरिहन्त और सिद्ध को ईश्वर मानते हैं। अरिहंतो और केवलज्ञानी की आयुष्य पूर्ण होने पर जब वे जन्ममरण से मुक्त होकर निर्वाण को प्राप्त करते है तब उन्हें सिद्ध कहा जाता है। उन्हीं की आराधना करते हैं और उन्हीं के निमित्त मंदिर आदि बनवाते हैं। जैन ग्रन्थों के अनुसार अर्हत् देव ने संसार को द्रव्यार्थिक नय की अपेक्षा से अनादि बताया है। जगत् का न तो कोई कर्ता है और न जीवों को कोई सुख दुःख देनेवाला है। अपने अपने कर्मों के अनुसार जीव सुख दुःख पाते हैं। जीव या आत्मा का मूल स्वभान शुद्ध, बुद्ध, सच्चिदानंदमय है, केवल पुदगल या कर्म के आवरण से उसका मूल स्वरुप आच्छादित हो जाता है। जिस समय यह पौद्गलिक भार हट जाता है उस समय आत्मा परमात्मा की उच्च दशा को प्राप्त होता है। जैन मत 'स्याद्वाद' के नाम से भी प्रसिद्ध है। स्याद्वाद का अर्थ है अनेकांतवाद अर्थात् एक ही पदार्थ में नित्यत्व और अनित्यत्व, सादृश्य और विरुपत्व, सत्व और असत्व, अभिलाष्यत्व और अनभिलाष्यत्व आदि परस्पर भिन्न धर्मों का सापेक्ष स्वीकार। इस मत के अनुसार आकाश से लेकर दीपक पर्यंत समस्त पदार्थ नित्यत्व और अनित्यत्व आदि उभय धर्म युक्त है। === तीर्थंकर === जैन धर्म मे 24 तीर्थंकरों को माना जाता है। तीर्थंकर धर्म तीर्थ का प्रवर्तन करते है। इस काल के २४ तीर्थंकर है- ऋषभदेव, अरिष्टनेमि आदि तीर्थंकरों का उल्लेख ऋग्वेदादि में बहुलता से मिलता है, जिससे यह स्वतः सिद्ध होता है कि वेदों की रचना के पहले जैन-धर्म का अस्तित्व भारत में था। विष्णु पुराण में श्री ऋषभदेव, मनुस्मृति में प्रथम जिन स्कंदपुराण, लिंगपुराण आदि में बाईसवें तीर्थंकर अरिष्टनेमि का उल्लेख आया है। दीक्षा मूर्ति-सहस्रनाम, वैशम्पायन सहस्रनाम महिम्न स्तोत्र में भगवान जिनेश्वर व अरहंत कह के स्तुति की गई है। योग वाशिष्ठ में श्रीराम ‘जिन’ भगवान की तरह शांति की कामना करते हैं। इसी तरह रुद्रयामलतंत्र में भवानी को जिनेश्वरी, जिनमाता, जिनेन्द्रा कहकर संबोधन किया है। नगर पुराण में कलयुग में एक जैन मुनि को भोजन कराने का फल कृतयुग में दस ब्राह्मणों को भोजन कराने के बराबर कहा गया है। अंतिम दो तीर्थंकर, पार्श्वनाथ और महावीर स्वामी ऐतिहासिक पुरुष है। महावीर का जन्म ईसा से 540 वर्ष पहले होना ग्रंथों से पाया जाया है। शेष के विषय में अनेक प्रकार की अलौकीक और प्रकृतिविरुद्ध कथाएँ हैं। ऋषभदेव की कथा भागवत आदि कई पुराणों में आई है और उनकी गणना हिंदुओं के २४ अवतारों में है। महाभारत अनुशासन पर्व, महाभारत शांतिपर्व, स्कन्ध पुराण, प्रभास पुराण, लंकावतार आदि अनेक ग्रंथो में अरिष्टनेमि का उल्लेख है। == दर्शन == === जैनधर्म के सिद्धान्त === जैन धर्म में अहिंसा को परमधर्म माना गया है। सब जीव जीना चाहते हैं, मरना कोई नहीं चाहता, अतएव इस धर्म में प्राणिवध के त्याग का सर्वप्रथम उपदेश है। केवल प्राणों का ही वध नहीं, बल्कि दूसरों को पीड़ा पहुँचाने वाले असत्य भाषण को भी हिंसा का एक अंग बताया है। महावीर ने अपने भिक्षुओं को उपदेश देते हुए कहा है कि उन्हें बोलते-चालते, उठते-बैठते, सोते और खाते-पीते सदा यत्नशील रहना चाहिए। अयत्नाचार पूर्वक कामभोगों में आसक्ति ही हिंसा है, इसलिये विकारों पर विजय पाना, इंद्रियों का दमन करना और अपनी समस्त वृत्तियों को संकुचित करने को जैनधर्म में सच्ची अहिंसा बताया है। पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और वनस्पति में भी जीवन है, अतएव पृथ्वी आदि एकेंद्रिय जीवों की हिंसा का भी इस धर्म में निषेध है। जैनधर्म का दूसरा महत्वपूर्ण सिद्धांत है कर्ममहावीर ने बार बार कहा है कि जो जैसा अच्छा, बुरा कर्म करता है उसका फल अवश्य ही भोगना पड़ता है तथा मनुष्य चाहे जो प्राप्त कर सकता है, चाहे जो बन सकता है, इसलिये अपने भाग्य का विधाता वह स्वयं है। जैनधर्म में ईश्वर को जगत् का कर्ता नहीं माना गया, तप आदि सत्कर्मों द्वारा आत्मविकास की सर्वोच्च अवस्था को ही ईश्वर बताया है। यहाँ नित्य, एक अथवा मुक्त ईश्वर को अथवा अवतारवाद को स्वीकार नहीं किया गया। ज्ञानावरण, दर्शनावरण, वेदनीय, मोहनीय, अंतराय, आयु, नाम और गोत्र इन आठ कर्मों का नाश होने से जीव जब कर्म के बंधन से मुक्त हो जाता है तो वह ईश्वर बन जाता है तथा राग-द्वेष से मुक्त हो जाने के कारण वह सृष्टि के प्रपंच में नहीं पड़ता। जैनधर्म में जीव, पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकाश और काल नाम के छ: द्रव्य माने गए हैं। ये द्रव्य लोकाकाश में पाए जाते हैं, अलोकाकाश में केवल आकाश ही है। जीव, अजीव, आस्रव, बंध संवर, निर्जरा और मोक्ष ये सात तत्व है। इन तत्वों के श्रद्धान से सम्यग्दर्शन की प्राप्ति होती है। सम्यग्दर्शन के बाद सम्यग्ज्ञान और फिर व्रत, तप, संयम आदि के पालन करने से सम्यक्चारित्र उत्पन्न होता है। इन तीन रत्नों को मोक्ष का मार्ग बताया है। रत्नत्रय की पूर्णता प्राप्त कर लेने पर मोक्ष की प्राप्ति होती है। मोक्ष होने पर जीव समस्त कर्मों के बंधन से मुक्त हो जाता है, और ऊर्ध्वगति होने के कारण वह लोक के अग्रभाग में सिद्धशिला पर अवस्थित हो जाता है। उसे अनंत दर्शन, अनंत ज्ञान, अनंत सुख और अनंत वीर्य की प्राप्ति होती है और वह अंतकाल तक वहाँ निवास करता है, वहाँ से लौटकर नहीं आता। अनेकान्तवाद जैनधर्म का तीसरा मुख्य सिद्धांत है। इसे अहिंसा का ही व्यापक रूप समझना चाहिए। राग द्वेषजन्य संस्कारों के वशीभूत ने होकर दूसरे के दृष्टिबिंदु को ठीक-ठीक समझने का नाम अनेकांतवाद है। इससे मनुष्य सत्य के निकट पहुँच सकता है। इस सिद्धांत के अनुसार किसी भी मत या सिद्धांत को पूर्ण रूप से सत्य नहीं कहा जा सकता। प्रत्येक मत अपनी अपनी परिस्थितयों और समस्याओं को लेकर उद्भूत हुआ है, अतएव प्रत्येक मत में अपनी अपनी विशेषताएँ हैं। अनेकांतवादी इन सबका समन्वय करके आगे बढ़ता है। आगे चलकर जब इस सिद्धांत को तार्किक रूप दिया गया तो यह स्याद्वाद नाम से कहा जाने लगा तथा, स्यात् अस्ति', 'स्यात् नास्ति', स्यात् अस्ति नास्ति', 'स्यात् अवक्तव्य,' 'स्यात् अस्ति अवक्तव्य', 'स्यात् नास्ति अवक्तव्य' और 'स्यात् अस्ति नास्ति अवक्तव्य', इन सात भागों के कारण सप्तभंगी नाम से प्रसिद्ध हुआ। === आचार विचार === जैन धर्म में आत्मशुद्धि पर बल दिया गया है। आत्मशुद्धि प्राप्त करने के लिये जैन धर्म में देह-दमन और कष्टसहिष्णुता को मुख्य माना गया है। निर्ग्रंथ और निष्परिग्रही होने के कारण तपस्वी महावीर नग्न अवस्था में विचरण किया करते थे। यह बाह्य तप भी अंतरंग शुद्धि के लिये ही किया जाता था। प्राचीन जैन सूत्रों में कहा गया है कि भले ही कोई नग्न अवस्था में रहे या एक एक महीने उपवास करे, किंतु यदि उसके मन में माया है तो उसे सिद्धि मिलने वाली नहीं। जैन आचार-विचार के पालन करने को 'शूरों का मार्ग' कहा गया है। जैसे लोहे के चने चबाना, बालू का ग्रास भक्षण करना, समुद्र को भुजाओं से पार करना और तलवार की धार पर चलना दुस्साध्य है, वैसे ही निर्ग्रंथ प्रवचन के आचरण को भी दुस्साध्य कहा गया है। बौद्ध धर्म की भाँति जैन धर्म में भी जातिभेद को स्वीकार नहीं किया गया। प्राचीन जैन ग्रंथों में कहा गया है कि सच्चा ब्राह्मण वही है जिसने राग, द्वेष और भय पर विजय प्राप्त की है और जो अपनी इंद्रियों पर निग्रह रखता है। जैन धर्म में अपने अपने कर्मों के अनुसार ही ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शुद्र की कल्पना की गई है, किसी जाति विशेष में उत्पन्न होने से नहीं। महावीर ने अनेक म्लेच्छ, चोर, डाकू, मछुए, वेश्या और चांडालपुत्रों को जैन धर्म में दीक्षित किया था। इस प्रकार के अनेक कथानक जैन ग्रंथों में पाए जाते हैं। जैन धर्म के सभी तीर्थकर क्षत्रिय कुल में हुए थे। इससे मालूम होता है कि पूर्वकाल में जैन धर्म क्षत्रियों का धर्म था, लेकिन आजकल अधिकांश वैश्य लोग ही इसके अनुयायी हैं। वैसे दक्षिण भारत में सेतवाल आदि कितने ही जैन खेतीबारी का धंधा करते हैं। पंचमों में ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य इन तीनों वर्णों के धंधे करनेवाले लोग पाए जाते हैं। जिनसेन मठ के अनुयायियों को छोड़कर और किसी मठ के अनुयायी चतुर्थ नहीं कहे जाते। चतुर्थ लोग साधारणतया खेती और जमींदारी करते हैं। सतारा और बीजापुर जिलों में कितने ही जैन धर्म के अनुयायी जुलाहे, छिपी, दर्जी, सुनार और कसेरे आदि का पेशा करते हैं। === सात तत्त्व === जैन ग्रंथों में सात तत्त्वों का वर्णन मिलता हैं। यह हैं- जीव- जैन दर्शन में आत्मा के लिए "जीव" शब्द का प्रयोग किया गया हैं। आत्मा द्रव्य जो चैतन्यस्वरुप है। अजीव- जड़ या की अचेतन द्रव्य को अजीव कहा जाता है। आस्रव - पुद्गल कर्मों का आस्रव करना बन्ध- आत्मा से कर्म बन्धना संवर- कर्म बन्ध को रोकना निर्जरा- कर्मों को क्षय करना मोक्ष - जीवन व मरण के चक्र से मुक्ति को मोक्ष कहते हैं। === व्रत === जैन धर्म में श्रावक और मुनि दोनों के लिए पाँच व्रत बताए गए है। तीर्थंकर आदि महापुरुष जिनका पालन करते है, वह महाव्रत कहलाते है - अहिंसा - किसी भी जीव को मन, वचन, काय से पीड़ा नहीं पहुँचाना। किसी जीव के प्राणों का घात नहीं करना। सत्य - हित, मित, प्रिय वचन बोलना। अस्तेय - बिना दी हुई वस्तु को ग्रहण नहीं करना। ब्रह्मचर्य - मन, वचन, काय से मैथुन कर्म का त्याग करना। अपरिग्रह- पदार्थों के प्रति ममत्वरूप परिणमन का बुद्धिपूर्वक त्याग।मुनि इन व्रतों का सूक्ष्म रूप से पालन करते है, वही श्रावक स्थूल रूप से करते है। === नौ पदार्थ === जैन ग्रंथों के अनुसार जीव और अजीव, यह दो मुख्य पदार्थ हैं। आस्रव, बन्ध, संवर, निर्जरा, मोक्ष, पुण्य, पाप अजीव द्रव्य के भेद हैं। === छह द्रव्य === जैन धर्म के अनुसार लोक ६ द्रव्यों से बना है। यह ६ द्रव्य शाश्वत हैं अर्थात इनको बनाया या मिटाया नहीं जा सकता। यह है जीव, पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकाश और काल। === त्रिरत्न === सम्यक् दर्शन - सम्यक् दर्शन को प्रगताने के लिए तत्त्व निर्णय की साधना करनी चहिये | तत्त्व निर्णय - मै इस शरीर आदि से भिन्न एक अखंड अविनाशी चैतन्य तत्त्व भगवान आत्मा हू, यह शरीरादी मै नहीं और यह मेरे नहीं | सम्यक् ज्ञान - सम्यक ज्ञान प्रगताने के लिए भेद ज्ञान की साधना करनी चहिये | भेद ज्ञान - जिस जीव का, जिस दृव्य का जिस समय जो कुछ भी होना है, वह उसकी तत्समय की योग्यतानुसार हो रहा है और होगा। उसे कोई ताल फेर बदल सकता नहीं। सम्यक् चारित्र - सम्यक चारित्र की साधना के लिए वस्तु स्वरुप की साधना करना चहिये। सम्यक चरित्र का तात्पर्य नैैतिक आचरण से है | पंचमहाव्रत का पालन ही शिक्षा है जो चरित्र निर्माण करती है|यह रत्नत्रय आत्मा को छोड़कर अन्य किसी द्रव्य में नहीं रहता। सम्यक्त्व के आठ अंग है —निःशंकितत्त्व, निःकांक्षितत्त्व, निर्विचिकित्सत्त्व, अमूढदृष्टित्व, उपबृंहन / उपगूहन, स्थितिकरण, प्रभावना, वात्सल्य। === चार कषाय === क्रोध, मान, माया, लोभ यह चार कषाय है जिनके कारण कर्मों का आस्रव होता है। इन चार कषाय को संयमित रखने के लिए माध्यस्थता, करुणा, प्रमोद, मैत्री भाव धारण करना चहिये | === चार गति === चार गतियाँ जिनमें संसरी जीव का जन्म मरण होता रहता है— देव गति, मनुष्य गति, तिर्यंच गति, नर्क गति। मोक्ष को पंचम गति भी कहा जाता है। === चार निक्षेप === नाम निक्षेप, स्थापना निक्षेप, द्रव्य निक्षेप, भाव निक्षेप। === अहिंसा === अहिंसा और जीव दया पर बहुत ज़ोर दिया जाता है। सभी जैन शाकाहारी होते हैं। === अनेकान्तवाद === अनेकान्त का अर्थ है- किसी भी विचार या वस्तु को अलग अलग दष्टिकोण से देखना, समझना, परखना और सम्यक भेद द्धारा सर्व हितकारी विचार या वस्तु को मानना ही अंनेकात है । === स्यादवाद === स्यादवाद का अर्थ है- विभिन्न अपेक्षाओं से वस्तुगत अनेक धर्मों का प्रतिपादन। === मन्त्र === जैन धर्म का परम पवित्र और अनादि मूलमंत्र है- णमो अरिहंताणं। णमो सिद्धाणं। णमो आइरियाणं। णमो उवज्झायाणं। णमो लोए सव्वसाहूणं॥अर्थात अरिहंतों को नमस्कार, सिद्धों को नमस्कार, आचार्यों को नमस्कार, उपाध्यायों को नमस्कार, सर्व साधुओं को नमस्कार। ये पंच परमेष्ठी हैं। === काल चक्र === जिस प्रकार काल हिंदुओं में मन्वंतर कल्प आदि में विभक्त है उसी प्रकार जैन में काल दो प्रकार का है— उत्सर्पिणी और अवसर्पिणी। अवसर्पिणी काल में समयावधि,हर वस्तु का मान,आयु,बल इत्यादि घटता है जबकि उत्सर्पिणी में समयावधि,हर वस्तु का मान और आयु, बल इत्यादि बढ़ता है इन दोनों का कालमान दस क्रोड़ाक्रोड़ी सागरोपम का होता है अर्थात एक समयचक्र बीस क्रोड़ाक्रोड़ी सागरोपम का होता है। प्रत्येक उत्सर्पिणी और अवसर्पिणी में 24 तीर्थंकर, 12 चक्रवर्ती, 9 बलदेव, 9 नारायण और 9 प्रतिनारायण का जन्म होता है। इन्हें त्रिसठ श्लाकापुरुष कहा जाता है। ऊपर जो २४ तीर्थंकर गिनाए गए हैं वे वर्तमान अवसर्पिणी के हैं। प्रत्येक उत्सिर्पिणी या अवसर्पिणी में नए नए जीव तीर्थंकर हुआ करते हैं। इन्हीं तीर्थंकरों के उपदेशों को लेकर गणधर लोग द्वादश अंगो की रचना करते हैं। ये ही द्वादशांग जैन धर्म के मूल ग्रंथ माने जाते है। == इतिहास == जैन धर्म कितना प्राचीन है, ठीक ठीक नहीं कहा जा सकता। जैन ग्रंथो के अनुसार जैन धर्म अनादिकाल से है। महावीर स्वामी या वर्धमान ने ईसा से ५२७ वर्ष पूर्व निर्वाण प्राप्त किया था। इसी समय से पीछे कुछ लोग विशेषकर यूरोपियन विद्वान् जैन धर्म का प्रचलित होना मानते हैं। जैनों ने अपने ग्रंथों को आगम, पुराण आदि में विभक्त किया है। प्रो॰ जेकोबी आदि के आधुनिक अन्वेषणों के अनुसार यह सिद्ध किया गया है की जैन धर्म बौद्ध धर्म से पहले का है। उदयगिरि, जूनागढ आदि के शिलालेखों से भी जैनमत की प्राचीनता पाई जाती है। हिन्दू ग्रन्थ, स्कन्द पुराण के अनुसार: "ऋषभदेव नाभिराज के पुत्र थे, ऋषभ के पुत्र भरत थे, और इनके ही नाम पर इस देश का नाम "भारतवर्ष" पड़ा"|भारतीय ज्योतिष में यूनानियों की शैली का प्रचार विक्रमीय संवत् से तीन सौ वर्ष पीछे हुआ। पर जैनों के मूल ग्रंथ अंगों में यवन ज्योतिष का कुछ भी आभास नहीं है। जिस प्रकार ब्रह्मणों की वेद संहिता में पंचवर्षात्मक युग है और कृत्तिका से नक्षत्रों की गणना है उसी प्रकार जैनों के अंग ग्रंथों में भी है। इससे उनकी प्राचीनता सिद्ध होती है। == भगवान महावीर के बाद == भगवान महावीर के पश्चात इस परंम्परा में कई मुनि एवं आचार्य भी हुये है, जिनमें से प्रमुख हैं- भगवान महावीर के पश्चात 62 बर्ष में तीन केवली आचार्य गौतम गणधर आचार्य सुधर्मास्वामी आचार्य जम्बूस्वामी इसके पश्चात 100 बर्षो में पॉच श्रुत केवली आचार्य भद्रबाहु- अंतिम श्रुत केवली आचार्य कुन्दकुन्द स्वामी आचार्य उमास्वामी आचार्य समन्तभद्र आचार्य पूज्यपाद आचार्य वीरसेन आचार्य जिनसेन आचार्य नेमिचन्द्र सिद्धान्तचक्रवर्ती == सम्प्रदाय == तीर्थंकर महावीर के समय तक अविछिन्न रही जैन परंपरा ईसा की तीसरी सदी में दो भागों में विभक्त हो गयी : दिगंबर और श्वेताम्बर। मुनि प्रमाणसागर जी ने जैनों के इस विभाजन पर अपनी रचना 'जैनधर्म और दर्शन' में विस्तार से लिखा है कि आचार्य भद्रबाहु ने अपने ज्ञान के बल पर जान लिया था कि उत्तर भारत में १२ वर्ष का भयंकर अकाल पड़ने वाला है इसलिए उन्होंने सभी साधुओं को निर्देश दिया कि इस भयानक अकाल से बचने के लिए दक्षिण भारत की ओर विहार करना चाहिए। आचार्य भद्रबाहु के साथ हजारों जैन मुनि दक्षिण की ओर वर्तमान के तमिलनाडु और कर्नाटक की ओर प्रस्थान कर गए और अपनी साधना में लगे रहे। परन्तु कुछ जैन साधु उत्तर भारत में ही रुक गए थे। अकाल के कारण यहाँ रुके हुए साधुओं का निर्वाह आगमानुरूप नहीं हो पा रहा था इसलिए उन्होंने अपनी कई क्रियाएँ शिथिल कर लीं, जैसे कटि वस्त्र धारण करना, ७ घरों से भिक्षा ग्रहण करना, १४ उपकरण साथ में रखना आदि। १२ वर्ष बाद दक्षिण से लौट कर आये साधुओं ने ये सब देखा तो उन्होंने यहाँ रह रहे साधुओं को समझाया कि आप लोग पुनः तीर्थंकर महावीर की परम्परा को अपना लें पर साधु राजी नहीं हुए और तब जैन धर्म में दिगंबर और श्वेताम्बर दो सम्प्रदाय बन गए। === दिगम्बर === दिगम्बर साधु वस्त्र नहीं पहनते है, नग्न रहते हैं|दिगम्बर मत में तीर्थकरों की प्रतिमाएँ पूर्ण नग्न बनायी जाती हैं और उनका श्रृंगार नहीं किया है। दिगंबर समुदाय तीन भागों विभक्त हैं। तारणपंथ दिगम्बर तेरापन्थ बीसपंथ === श्वेताम्बर === श्वेताम्बर एवं साध्वियाँ और संन्यासी श्वेत वस्त्र पहनते हैं, तीर्थकरों की प्रतिमाएँ प्रतिमा पर धातु की आंख, कुंडल सहित बनायी जाती हैं और उनका शृंगार किया जाता है। श्वेताम्बर भी दो भाग मे विभक्त है: देरावासी - यॆ तीर्थकरों की प्रतिमाएँ की पूजा करतॆ हैं. Wikipedia

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जैन धर्म एक धर्म और दर्शन है जो गुजरात में बहुत महत्व रखता है। धर्म अनुयायीयों का विश्वास है कि उनके २२वें तीर्थकर को यहाँ मोक्ष की प्राप्ती हुई थी। बहुत से अन्य साधुओं का निर्वाण भी यहाँ हुआ; विशेष रूप से पवित्र गिरनार और सत्रुंजय पर्वत। Wikipedia
विश्व के सबसे प्राचीन धर्मो में से एक Wikidata

    •     bn:00047894n     •     NOUN     •     Concept    •     Updated on 2019/07/22     •     Categories: Giainismo

  giainismo · jainismo · Ajiva · Giainista · Jainista

Il giainismo è la religione dei seguaci di Jina, epiteto di Vardhamāna, noto anche con i nomi di Nāyāputta, dal nome del clan cui apparteneva, Jñāta, Muni, Bhagavān, Araha, Veyavī e con i celebri epiteti di Mahāvīra e di Tīrthaṃkara, che visse nel VI secolo a.C. nella regione del Bihar. Wikipedia

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Antica religione Wikidata

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    •     bn:00047894n     •     NOUN     •     Concept    •     Updated on 2019/07/22     •     Categories: インドの宗教, ジャイナ教, 東洋文化, 菜食主義...

  ジャイナ教 · ジャイナ教徒

ジャイナ教(ジャイナきょう、サンスクリット語: जैन、英: Jainism)は、マハーヴィーラ(ヴァルダマーナ、前6世紀-前5世紀)を祖師と仰ぎ、特にアヒンサー(不害)の禁戒を厳守するなど徹底した苦行・禁欲主義をもって知られるインドの宗教。 Wikipedia

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完全無欠あるいは絶対的な存在を否定する Japanese WordNet
ヒンズー教に対する反乱として紀元前6世紀に成立した宗教 Japanese WordNet
禁欲と不死と魂の転生を力説する Japanese WordNet

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  джайнизм · Джайн · Джайна · Джайны · Шветамбара

Джайни́зм Wikipedia

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  jainismo · Jain · Arhata · Doctrina jainista · Filosofía jainista

El jainismo es una doctrina originada en la India, que surge en el siglo VI a. Wikipedia

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Religión de la India Wikidata


Translations

جاينية, جَايْنِيَّة, جَيْنِيَّة, يانية, الجاينية, الجينية, اليانية, جانية, جايني, جاينيه, جنية, جينية, mahavrata, nirgrantha, جاين
耆那教, 尼干子派, 尼犍外道, 尼犍子, 裸行外道
jainism, jain dharma, jaina, jaini, jainy, Jain Mata, jainist, jain, gujarati jain, gujarati jains, jain faith, jain family, jain religion, jain temples in the west, jaina dharma, jainas, jainism and terapanth, jainists, jains, jane religion, janism, Jin Sashana, Jina Sashana, Jina sāsana, jiv daya, nigantha, niganthas, niggantha, Nirgranthas, Puja, Religion of nonvoilence, samanam, shraman dharma, shramana dharma, जैन धर्म
jaïnisme, jinisme, djaïnisme, jainisme, Mahavrata, Harsh Jain, Ghaziabad, Jaina, Jaïn, Jaïna, Jaïns, jain, nirgrantha
jainismus, dschaina, dschainismus, dschinismus, jainas, jinismus, thirtankara, Tirthamkara, tirthankara, jain, mahavrata, nirgrantha
τζαϊνισμός, ζαϊνισμός, jain, mahavrata, nirgrantha
ג'ייניזם, ג'איניזם, ג'יניזם, mahavrata, nirgrantha, ג'אין
जैन धर्म, गुजरात में जैन धर्म, जैन, dharma, moksa, गुजराती जैन, जैनधर्म, mahavrata, nirgrantha
giainismo, jainismo, Ajiva, Giainista, Jainista, jain, mahavrata, nirgrantha
ジャイナ教, ジャイナ教徒, nirgrantha(
джайнизм, Джайн, Джайна, Джайны, Шветамбара, Шветапата, jain, mahavrata, nirgrantha, джайнизма
jainismo, Jain, Arhata, Doctrina jainista, Filosofía jainista, Jaina, Jainism, Jainista, Jainistas, Jains, Jina, Mitologia jainista, Mitologia yaina, Mitología jainista, Mitología yaina, Religion jainista, Religion yain, Religion yainista, Religión jaina, Religión jainista, Religión yain, Religión yaina, Religión yainista, Tradicion jaina, Tradición jaina, Yain, Yaina, Yainas, Yainismo, Yainista, Yainistas, mahavrata, nirgrantha

Sources

WordNet senses

WordNet du Français

jaïnisme

MultiWordNet senses

giainismo, jainismo

Multilingual Central Repository senses

jainismo

WOLF senses

jaïnisme, jinisme

Wikipedia redirections

Wikiquote page titles

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Translations from Wikipedia sentences

mahavrata, nirgrantha, جاين
jain, jaïnisme, mahavrata, nirgrantha
jain, jainismus, mahavrata, nirgrantha
jain, mahavrata, nirgrantha, ζαϊνισμός
mahavrata, nirgrantha, ג'אין, ג'ייניזם
mahavrata, nirgrantha, जैन, जैन धर्म
giainismo, jain, mahavrata, nirgrantha
nirgrantha(
jain, mahavrata, nirgrantha, джайнизма
jain, jainismo, mahavrata, nirgrantha
5 sources | 15 senses
4 sources | 7 senses
7 sources | 45 senses
7 sources | 22 senses
5 sources | 15 senses
5 sources | 9 senses
5 sources | 9 senses
5 sources | 14 senses
6 sources | 13 senses
5 sources | 5 senses
5 sources | 12 senses
6 sources | 38 senses

Compounds

BabelNet

Marwari Jain, Jain texts, Jainism in India, Jain community, Jain philosophy, Jainism and Hinduism, Jain festival, Jain temple, Jain art, Jain literature, Jain center, Timeline of Jainism, Jain architecture, Jains in India, Jain monk, Jain canons, Jainism in Southeast Asia, Jain scriptures, Jain communities, History of Jainism, Jain monks, fasting in Jainism, Buddhism and Jainism, Jain temples, Jain poet, Jain text
ordres principaux du jaïnisme, méditation jaïne
templo jaina, religión jaina

Other forms

BabelNet

الجاينية, الديانة الجاينية
耆那教徒
five major vows of Jainism, geographical spread and influence, Gujarat, Jain community, nirgantha, Jain monk, Jaina
jaïne, Jains, jaïnes, jaïniste, jains, jaïnistes
Jain, jainistischen, Jaina-Tirthankaras, jainistische, Jains, jainistischer, Jaina, Tirthankaras
Ζαϊνισμού, Τζαϊνισμό, Τζαϊνιστικοί, Τζαϊνιστές, Τζαϊνισμού, Τζαϊνιστικούς
ג'יינים, ג'ייניים, ג'יינית
जैन ग्रंथ, जैनों, जैनियों
gianisti, jaina, Jainismo, giainiste, gianista, jainisti, giainisti, Jaina
джайнов
yaina, jainitas, jainas

External Links

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