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    •     bn:02430151n     •     NOUN     •     Concept    •     Updated on 2019/11/09     •     Categories: أسماك, أسماك الزينة, أسماك زينة, أمراض الأسماك...

  أسماك الزينة · أسماك الزينه · أسماك زينة · اسماك الزينة · سمك الزينة

أسماك الزينة هي هواية شعبية تكون بحفظ الأسماك في المنزل بأحواض أو بأي إناء فيه ماء، وتستخدم أيضاً كنوع من التزيين والتجميل للأماكن. Wikipedia

    •     bn:02430151n     •     NOUN     •     Concept    •     Updated on 2019/11/09     •     Categories: 水族饲养

  水族饲养 · 养鱼

水族饲养是指在家中水族箱或池塘饲养鱼类等水族的一种爱好。 Wikipedia

    •     bn:02430151n     •     NOUN     •     Concept    •     Updated on 2019/11/09     •     Categories: Archived copy as title, authors list, Fish diseases, Fishkeeping...

  fishkeeping · Aquarism · Aquarist · Aquaristic · Aquaristics

Fishkeeping is a popular hobby, practiced by aquarists, concerned with keeping fish in a home aquarium or garden pond. Wikipedia

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Covers the activities around the aquarium Wikidata
The cultivation of fish as a hobby. Wiktionary

    •     bn:02430151n     •     NOUN     •     Concept    •     Updated on 2019/11/09     •     Categories: Aquariophilie, Soin à l'animal de compagnie

  Aquariophilie · Aquariophile · Aquariophiles

L’aquariophilie est le loisir qui consiste à s'occuper d'animaux et de plantes aquatiques dans un aquarium ou un étang en mettant en valeur l'aspect esthétique d'un milieu aquatique. Wikipedia

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Comprend les activités autour de l''aquarium Wikidata

    •     bn:02430151n     •     NOUN     •     Concept    •     Updated on 2019/11/09     •     Categories: Aquaristik

  Aquaristik · Aquarianer

Die Aquaristik umfasst die Tätigkeiten, die mit dem Betrieb eines Aquariums und der Pflege der darin gehaltenen Lebewesen verbunden sind. Wikipedia

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Umfasst die Tätigkeiten, rund um das Aquariums Wikidata

IS A
    •     bn:02430151n     •     NOUN     •     Concept    •     Updated on 2019/11/09

  aquarist · fishkeeping · χομπίστες From automatic translation

 Fishkeeping is a popular hobby, practiced by aquarists, concerned with keeping fish in a home aquarium or garden pond. Wikipedia

    •     bn:02430151n     •     NOUN     •     Concept    •     Updated on 2019/11/09     •     Categories: דגי נוי, תבניות ציטוט עם תאריך ושנה בו זמנית

  גידול דגי נוי · דגי נוי

גידול דגי נוי הוא תחביב פופולרי, שבו חובבים מגדלים דגים באקווריום בבית או לחלופין בבריכה בגינה. Wikipedia

    •     bn:02430151n     •     NOUN     •     Concept    •     Updated on 2019/11/09     •     Categories: कृषि, मत्स्य पालन

  मत्स्यपालन · नीली क्रान्ति · मछली पकड़ना · मछली पालन · मत्स्य-पालन

मछली जलीय पर्यावरण पर आश्रित जलचर जीव है तथा जलीय पर्यावरण को संतुलित रखने में इसकी बहुत महत्वपूर्ण भूमिका होती है। यह कथन अपने में पर्याप्त बल रखता है जिस पानी में मछली नहीं हो तो निश्चित ही उस पानी की जल जैविक स्थिति सामान्य नहीं है। वैज्ञानिकों द्वारा मछली को जीवन सूचक माना गया है। विभिन्न जलस्रोतों में चाहे तीव्र अथवा मन्द गति से प्रवाहित होने वाली नदियां हो, चाहे प्राकृतिक झीलें, तालाब अथवा मानव-निर्मित बड़े या मध्यम आकार के जलाशय, सभी के पर्यावरण का यदि सूक्ष्म अध्ययन किया जाय तो निष्कर्ष निकलता है कि पानी और मछली दोनों एक दूसरे से काफी जुड़े हुए हैं। पर्यावरण को संतुलित रखने में मछली की विशेष उपयोगिता है। == महत्व == शरीर के पोषण तथा निर्माण में संतुलित आहार की आवश्यकता होती है। संतुलित आहार की पूर्ति विभिन्न खाद्य पदार्थों को उचित मात्रा में मिलाकर की जा सकती है। शरीर को स्वस्थ रखने के लिए प्रोटीन, वसा, कार्बोहाइड्रेट, विटामिन, खनिज लवण आदि की आवश्यकता होती है जो विभिन्न भोज्य पदार्थों में भिन्न-भिन्न अनुपातों में पाये जाते हैं। स्वस्थ शरीर के निर्माण हेतु प्रोटीन की अधिक मात्रा होनी चाहिए क्योंकि यह मांसपेशियों, तंतुओं आदि की संरचना करती है। विटामिन, खनिज, लवण आदि शरीर की मुख्य क्रियाओं को संतुलित करते हैं। मछली, मांस, अण्डे, दूध, दालों आदि का उपयोग संतुलित आहार में प्रमुख रूप से किया जा सकता है। मछलियों में लगभग 70 से 80 प्रतिशत पानी, 13 से 22 प्रतिशत प्रोटीन, 1 से 3.5 प्रतिशत खनिज पदार्थ एवं 0.5 से 20 प्रतिशत चर्बी पायी जाती है। कैल्शियम, पोटैशियम, फास्फोरस, लोहा, सल्फर, मैग्नीशियम, तांबा, जस्ता, मैग्नीज, आयोडीन आदि खनिज पदार्थ मछलियों में उपलब्ध होते हैं जिनके फलस्वरूप मछली का आहार काफी पौष्टिक माना गया है। इनके अतिरिक्त राइबोफ्लोविन, नियासिन, पेन्टोथेनिक एसिड, बायोटीन, थाइमिन, विटामिन बी12, बी 6 आदि भी पाये जाते हैं जोकि स्वास्थ्य के लिए काफी लाभकारी होते हैं। विश्व के सभी देशों में मछली के विभिन्न प्रकार के व्यंजन बनाकर उपयोग में लाये जाते हैं। मछली के मांस की उपयोगिता सर्वत्र देखी जा सकती है। मीठे पानी की मछली में वसा बहुत कम पायी जाती है व इसमें शीघ्र पचने वाला प्रोटीन होता है। सम्पूर्ण विश्व में लगभग 20,000 प्रजातियां व भारत वर्ष में 2200 प्रजातियां पाये जाने की जानकारी हैं। गंगा नदी प्रणाली जो कि भारत की सबसे बड़ी नदी प्रणाली है, में लगभग 375 मत्स्य प्रजातियां उपलब्ध हैं। वैज्ञानिकों द्वारा उत्तर प्रदेश व बिहार में 111 मत्स्य प्रजातियों की उपलब्धता बतायी गयी है। == उत्तर प्रदेश में मछली पालन == मछली एक उच्च कोटि का खाद्य पदार्थ है। इसके उत्पादन में वृद्धि किये जाने हेतु उत्तर प्रदेश मत्स्य विभाग निरन्तर प्रयत्नशील है। उत्तर प्रदेश के ग्रामीण अंचलों में विभिन्न प्रकार के तालाब, पोखरें और जल प्रणालियां प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं जिनमें वैज्ञानिक रूप से मत्स्य पालन अपना कर मत्स्य उत्पादन में वृद्धि करके लोगों को पोषक और संतुलित आहार उपलब्ध कराया जा सकता है। === मत्स्य पालकों हेतु दिशानिर्देश === मत्स्य पालन हेतु कोई भी इच्छुक व्यक्ति जिसके पास अपना निजी तालाब हो अथवा निजी भूमि या पट्टे का तालाब, उत्तर प्रदेश में किसी भी जिले में मत्स्य पालन की सुविधा प्राप्त कर सकता है :- इच्छुक व्यक्ति जिनके पास अपनी निजी भूमि या तालाब हो वह उस भूमि सम्बन्धी खसरा खतौनी लेकर जनपदीय कार्यालय सम्पर्क करे। पट्टे के तालाब पर मत्स्य पालन हेतु पट्टा निर्गमन प्रमाण-पत्र के साथ जनपदीय कार्यालय सम्पर्क किया जा सकता है।विभाग द्वारा क्षेत्रीय मत्स्य विकास अधिकारी/अभियन्ता द्वारा भूमि/तालाब का सर्वेक्षण कर प्रोजेक्ट तैयार किया जाता है। तालाबों/प्रस्तावित तालाबों की भूमि का मृदा-जल के नमूनों का परीक्षण विभागीय प्रयोगशाला में नि:शुल्क किया जाता है तथा इसकी विधिवत जानकारी इच्छुक व्यक्ति को दी जाती है। मृदा-जल के परीक्षणोंपरान्त कोई कमी पायी जाती है तो उसका उपचार/निदान मत्स्य पालन हेतु इच्छुक व्यक्ति को बताया जाता है। यदि भूमि/तालाब मत्स्य पालन योग्य है तो जनपदीय कार्यालय द्वारा प्रोजेक्ट तैयार कर संस्तुति सहित प्रोजेक्ट बैंक को ऋण स्वीकृति हेतु भेजा जाता है। बैंक स्वीकृति प्राप्त होने पर अनुदान की राशि बैंक को भेज दी जाती है। मत्स्य पालन की तकनीकी जानकारी एवं मत्स्य पालन हेतु आवश्यक प्रशिक्षण ब्लाक/तहसील स्तर पर क्षेत्रीय मत्स्य विकास अधिकारी/जनपदीय अथवा मण्डलीय कार्यालय से सम्पर्क कर प्राप्त की जा सकती है। मत्स्य बीज की आपूर्ति मत्स्य विभाग/मत्स्य विकास निगम द्वारा की जाती है। इच्छुक मत्स्य पालक इनके द्वारा मत्स्य बीज प्राप्त कर सकते हैं। समय-समय पर कृषि मेलों/प्रदर्शनियों में विभागीय योजनाओं एवं मत्स्य पालकों को दी जा रही सुविधाओं की जानकारी दी जाती है। मत्स्य विपणन के विषय में जानकारी सम्बन्धित जनपदीय कार्यालय से प्राप्त की जा सकती है। === मछली पालन का कैलेण्डर === मत्स्य पालन हेतु निम्न कैलेण्डर के अनुसार मार्गदर्शन लिया जा सकता है :- ==== पहली तिमाही ==== अप्रैल, मई व जून का महीना। उपयुक्त तालाब का चुनाव। नये तालाब के निर्माण हेतु उपयुक्त स्थल का चयन। मिट्टी पानी की जांच। तालाब सुधार/निर्माण हेतु मत्स्य पालक विकास अभिकरणों के माध्यम से तकनीकी व आर्थिक सहयोग लेते हुए तालाब सुधार/निर्माण कार्य की पूर्णता। अवांछनीय जलीय वनस्पतियों की सफाई। एक मीटर पानी की गहराई वाले एक हेक्टेयर के तालब में 25 कुन्तल महुआ की खली के प्रयोग के द्वारा अथवा बार-बार जाल चलवाकर अवांछनीय मछलियों की निकासी। उर्वरा शक्ति की वृद्धि हेतु 250 कि०ग्रा०/हे० चूना तथा सामान्यत: 10 से 20 कुन्तल/हेक्टे०/मास गोबर की खाद का प्रयोग। ==== दूसरी तिमाही ==== जुलाई, अगस्त एवं सितम्बर का महीना मत्स्य बीज संचय के पूर्व पानी की जांच । तालाब में 25 से 50 मि०मी० आकार के 10,000 से 15,000 मत्स्य बीज का संचय। पानी में उपलब्ध प्राकृतिक भोजन की जांच। गोबर की खाद के प्रयोग के 15 दिन बाद सामान्यत: 49 कि०ग्रा०/हे०/मास की दर से एन०पी०के० खादों का प्रयोग। ==== तीसरी तिमाही ==== अक्टूबर, नवम्बर एवं दिसम्बर का महीना मछलियों की वृद्धि दर की जांच। मत्स्य रोग की रोकथाम हेतु सीफेक्स का प्रयोग अथवा रोग ग्रस्त मछलियों को पोटेशियम परमैगनेट या नमक के घोल में डालकर पुन: तालाब में छोड़ना। पानी में प्राकृतिक भोजन की जांच। पूरक आहार दिया जाना। ग्रास कार्प मछली के लिए जलीय वनस्पतियों का प्रयोग। उर्वरकों का प्रयोग। ==== चौथी तिमाही ==== जनवरी, फरवरी एवं मार्च का महीना। बड़ी मछलियों की निकासी एवं विक्रय। बैंक के ऋण किस्त की अदायगी। एक हेक्टेयर के तालाब में कामन कार्प मछली के लगभग 1500 बीज का संचय पूरक आहार दिया जाना। उर्वरकों का प्रयोग। === मत्स्य पालन का विस्तृत विवरण === पालन हेतु उपयुक्त तालाब का चयन/निर्माणजिस प्रकार कृषि के लिए भूमि आवश्यक है उसी प्रकार मत्स्य पालन के लिए तालाब की आवश्यकता होती है। ग्रामीण अंचलों में विभिन्न आकार प्रकार के तालाब व पोखरें पर्याप्त संख्या में उपलब्ध होते हैं जो कि निजी, संस्थागत अथवा गांव सभाओं की सम्पत्ति होते हैं। इस प्रकार के जल संसाधन या तो निष्प्रयोज्य पड़े रहते हैं अथवा उनका उपयोग मिट्टी निकालने, सिंघाड़े की खेती करने, मवेशियों को पानी पिलाने, समीपवर्ती कृषि योग्य भूमि को सींचने आदि के लिए किया जाता है। मत्स्य पालन हेतु 0.2 हेक्टेयर से 5.0 हेक्टेयर तक के ऐसे तालाबों का चयन किया जाना चाहिए जिनमें वर्ष भर 8-9 माह पानी भरा रहे। तालाबों को सदाबहार रखने के लिए जल की आपूर्ति का साधन होना चाहिए। तालाब में वर्ष भर एक से दो मीटर पानी अवश्य बना रहे। तालाब ऐसे क्षेत्रों में चुने जायें जो बाढ़ से प्रभावित न होते हों तथा तालाब तक आसानी से पहुंचा जा सके। बन्धों का कटा फटा व ऊँचा होना, तल का असमान होना, पानी आने-जाने के रास्तों का न होना, दूसरे क्षेत्रों से अधिक पानी आने-जाने की सम्भावनाओं का बना रहना आदि कमियां स्वाभाविक रूप से तालाब में पायी जाती हैं जिन्हें सुधार कर दूर किया जा सकता है। तालाब को उचित आकार-प्रकार देने के लिए यदि कही पर टीले आदि हों तो उनकी मिट्टी निकाल का बन्धों पर डाल देनी चाहिए। कम गहराई वाले स्थान से मिट्टी निकालकर गहराई एक समान की जा सकती है। तालाब के बन्धें बाढ़ स्तर से ऊंचे रखने चाहिए। पानी के आने व निकास के रास्ते में जाली की व्यवस्था आवश्यक है ताकि पाली जाने वाली मछलियां बाहर न जा सकें और अवांछनीय मछलियां तालाब में न आ सके। तालाब का सुधार कार्य माह अप्रैल व मई तक अवश्य करा लेना चाहिए जिससे मत्स्य पालन करने हेतु समय मिल सके। नये तालाब के निर्माण हेतु उपयुक्त स्थल का चयन विशेष रूप से आवश्यक है। तालाब निर्माण के लिए मिट्टी की जल धारण क्षमता व उर्वरकता को चयन का आधार माना जाना चाहिए। ऊसर व बंजर भूमि पर तालाब नहीं बनाना चाहिए। जिस मिट्टी में अम्लीयता व क्षारीयता अधिक हो उस पर भी तालाब निर्मित कराया जाना उचित नहीं होता है। इसके अतिरिक्त बलुई मिट्टी वाली भूमि में भी तालाब का निर्माण उचित नहीं होता है क्योंकि बलुई मिट्टी वाले तालाबों में पानी नहीं रूक पाता है। चिकनी मिट्टी वाली भूमि में तालाब का निर्माण सर्वथा उपयुक्त होता है। इस मिट्टी में जलधारण क्षमता अधिक होती है। मिट्टी की पी-एच 6.5-8.0, आर्गेनिक कार्बन 1 प्रतिशत तथा मिट्टी में रेत 40 प्रतिशत, सिल्ट 30 प्रतिशत व क्ले 30 प्रतिशत होना चाहिए। तालाब निर्माण के पूर्व मृदा परीक्षण मत्स्य विभाग की प्रयोगशालाओं अथवा अन्य प्रयोगशालाओं से अवश्य करा लेना चाहिए। तालाब के बंधे में दोनों ओर के ढलानों में आधार व ऊंचाई का अनुपात साधारणतया 2:1 या 1.5:1 होना उपयुक्त है। बंधे की ऊंचाई आरम्भ से ही वांछित ऊंचाई से अधिक रखनी चाहिए ताकि मिट्टी पीटने, अपने भार तथा वर्षा के कारण कुछ वर्षों तक बैठती रहे। बंध का कटना वनस्पतियों व घासों को लगाकर रोका जा सकता है। इसके लिए केले, पपीते आदि के पेड़ बंध के बाहरी ढलान पर लगाये जा सकते हैं। नये तालाब का निर्माण एक महत्वपूर्ण कार्य है तथा इस सम्बन्ध में मत्स्य विभाग के अधिकारियों का परामर्श लिया जाना चाहिए। मिट्टी पानी की जांचमछली की अधिक पैदावार के लिए तालाब की मिट्टी व पानी का उपयुक्त होना परम आवश्यक है। मण्डल स्तर पर मत्स्य विभाग की प्रयोगशालाओं द्वारा मत्स्य पालकों के तालाबों की मिट्टी पानी की नि:शुल्क जांच की जाती है तथा वैज्ञानिक विधि से मत्स्य पालन करने के लिए तकनीकी सलाह दी जाती है। वर्तमान में मत्स्य विभाग की 12 प्रयोगशालायें कार्यरत हैं। केन्द्रीय प्रयोगशाला मत्स्य निदेशालय, 7 फैजाबाद रोड, लखनऊ में स्थित है। शेष 11 प्रयोगशालाये फैजाबाद, गोरखपुर, वाराणसी, आजमगढ़, मिर्जापुर, इलाहाबाद, झांसी, आगरा, बरेली, मेरठ मण्डलों में उप निदेशक मत्स्य के अन्तर्गत तथा जौनपुर जनपद में गूजरताल मत्स्य प्रक्षेत्र पर कार्यरत हैं। तालाब प्रबन्ध व्यवस्थामत्स्य पालन प्रारम्भ करने से पूर्व यह अत्यधिक आवश्यक है कि मछली का बीज डालने के लिए तालाब पूर्ण रूप से उपयुक्त हो। अनावश्यक जलीय पौधों का उन्मूलनतालाब में आवश्यकता से अधिक जलीय पौधों का होना मछली की अच्छी उपज के लिए हानिकारक है। यह पौधे पानी का बहुत बड़ा भाग घेरे रहते हैं जिसमें मछली के घूमने-फिरने में असुविधा होती है। साथ ही यह सूर्य की किरणों को पानी के अन्दर पहुंचने में भी बाधा उत्पन्न करते हैं। परिणामस्वरूप मछली का प्राकृतिक भोजन उत्पन्न होना रूक जाता है और प्राकृतिक भोजन के अभाव में मछली की वृद्धि पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। इसके अतिरिक्त यह पौधे मिट्टी में पाये जाने वाले रासायनिक पदार्थों का प्रचूषण करके अपनी बढ़ोत्तरी करते हैं और पानी की पौष्टिकता कम हो जाती है। मछली पकड़ने के लिए यदि जाल चलाया जाय तब भी यह पौधे रूकावट डालते हैं। सामान्यत: तालाबों में जलीय पौधे तीन प्रकार के होते हैं - एक पानी की सतह वाले जैसे जलकुम्भी, लेमना आदि, दूसरे जड़ जमाने वाले जैसे कमल इत्यादि और तीसरे जल में डूबे रहने वाले जैसे हाइड्रिला, नाजाज आदि। यदि तालाब में जलीय पौधों की मात्रा कम हो तो इन्हें जाल चलाकर या श्रमिक लगाकर जड़ से उखाड़कर निकाला जा सकता है। अधिक जलीय वनस्पति होने की दशा में रसायनों का प्रयोग जैसे 2-4 डी सोडियम लवण, टेफीसाइड, हैक्सामार तथा फरनेक्सान 8-10 कि०ग्रा० प्रति हे० जलक्षेत्र में प्रयोग करने से जलकुम्भी, कमल आदि नष्ट हो जाते हैं। रसायनों के प्रयोग के समय विशेष जानकारी मत्स्य विभाग के कार्यालयों से प्राप्त की जानी चाहिए। कुछ जलमग्न पौधे ग्रास कार्प मछली का प्रिय भोजन होते हैं अत: इनकी रोकथाम तालाब में ग्रासकार्प मछली पालकर की जा सकती है। उपयुक्त यही है कि अनावश्यक पौधों का उन्मूलन मानव-शक्ति से ही सुनिश्चित किया जाय। अवांछनीय मछलियों की सफाईपुराने तालाबों में बहुत से अनावश्यक जन्तु जैसे कछुआ, मेंढक, केकड़े और मछलियां जैसे सिंधरी, पुठिया, चेलवा आदि एवं भक्षक मछलियां उदाहरणार्थ पढ़िन, टैंगन, सौल, गिरई, सिंघी, मांगुर आदि पायी जाती हैं जो कि तालाब में उपलब्ध भोज्य पदार्थों को अपने भोजन के रूप में ग्रहण करती हैं। मांसाहारी मछलियां कार्प मछलियों के बच्चों को खा जाती है जिससे मत्स्य पालन पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। अत: इनकी सफाई नितान्त आवश्यक है। अवांछनीय मछलियों का निष्कासन बार-बार जाल चलाकर या पानी निकाल कर अथवा महुआ की खली के प्रयोग द्वारा किया जा सकता है। महुए की खली का प्रयोग एक हेक्टेयर क्षेत्रफल के एक मीटर पानी की गहराई वाले तालाब में 25 कुंटल की दर से किया जाना चाहिए। इसके परिणाम स्वरूप 6-8 घंटों में सारी मछलियां मर कर ऊपर आ जाती हैं जिन्हें जाल चलाकर एकत्र करके बाजार में बेचा जा सकता है। महुए की खली का प्रयोग तालाब के लिए दोहरा प्रभाव डालता है। विष के अलावा 15-20 दिन बाद यह खाद का भी कार्य करती है जिससे मछली के प्राकृतिक भोजन का उत्पादन होता है। जलीय उत्पादकता हेतु चूने का प्रयोगपानी का हल्का क्षारीय होना म्त्स्य पालन के लिए लाभप्रद है। पानी अम्लीय अथवा अधिक क्षारीय नहीं होना चाहिए। चूना जल की क्षारीयता बढ़ाता है अथवा जल की अम्लीयता व क्षारीयता को संतुलित करता है। इसके अतिरिक्त चूना मछलियों को विभिन्न परोपजीवियों के प्रभाव से मुक्त रखता है और तालाब का पानी उपयुक्त बनाता है। एक हेक्टेयर के तालाब में 250 कि०ग्रा० चूने का प्रयोग मत्स्य बीज संचय से एक माह पूर्व किया जाना चाहिए। गोबर की खाद का प्रयोगतालाब की तैयारी में गोबर की खाद की महत्वपूर्ण भूमिका है। इससे मछली का प्राकृतिक भोजन उत्पन्न होता है। गोबर की खाद, मत्स्य बीज संचय से 15-20 दिन पूर्व सामान्तया 10-20 टन प्रति हे० प्रति वर्ष 10 समान मासिक किश्तों में प्रयोग की जानी चाहिए। यदि तालाब की तैयारी में अवांछनीय मछलियों के निष्कासन के लिए महुआ की खली डाली गयी हो तो गोबर की खाद की पहली किश्त डालने की आवश्यकता नहीं है। रासायनिक खादों का प्रयोगसामान्यत: रासायनिक खादों में यूरिया 200 किलोग्राम, सिंगिल सुपर फास्फेट 250 कि०ग्रा० व म्यूरेट ऑफ पोटाश 40 कि०ग्रा० अर्थात कुल मिश्रण 490 कि०ग्रा० प्रति हे० प्रति वर्ष 10 समान मासिक किश्तों में प्रयोग किया जाना चाहिए। इस प्रकार 49 कि०ग्रा० प्रति हे० प्रति माह रासायनिक खादों के मिश्रण को गोबर की खाद के प्रयोग 15 दिन बाद तालाब में डाला जाना चाहिए। यदि तालाब के पानी का रंग गहरा हरा या गहरा नीला हो जाये तो उर्वरकों का प्रयोग तब तक बन्द कर देना चाहिए जब तक पानी का रंग उचित अवस्था में न आ जाये। मत्स्य बीज की आपूर्तितालाब में ऐसी उत्तम मत्स्य प्रजातियों के शुद्ध बीज का संचय सुनिश्चित किया जाना चाहिए जो कि एक ही जलीय वातावरण में रहकर एक दूसरे को क्षति न पहुंचाते हुए तालाब की विभिन्न सतहों पर उपलब्ध भोजन का उपभोग करें तथा तीव्रगति से बढ़ें। भारतीय मेजर कार्प मछलियों में कतला, रोहू एवं नैन तथा विदेशी कार्प मछलियों में सिल्वर कार्प, ग्रास कार्प एवं कामन कार्प का मिश्रित पालन विशेष लाभकारी होता है। उत्तम मत्स्य प्रजातियों का शुद्ध बीज, मत्स्य पालन की आधारभूत आवश्यकता है। उत्तर प्रदेश मत्स्य विकास निगम की हैचरियों तथा मत्स्य विभाग के प्रक्षेत्रों पर उत्पादित बीज की आपूर्ति मत्स्य पालकों को आक्सीजन पैकिंग में तालाब तक निर्धारित सरकारी दरों पर की जाती है। उत्तर प्रदेश को मत्स्य बीज उत्पादन के क्षेत्र में मांग के अनुसार आत्मनिर्भर बनाने के उद्देश्य मत्स्य बीज उत्पादन के निजीकरण पर विशेष बल दिया जा रहा है तथा निजी क्षेत्र में 10 मिलियन क्षमता वाली एक मिनी मत्स्य बीज हैचरी की स्थापना के लिए रू० 8.00 लाख तक बैंक ऋण व इस पर 10 प्रतिशत शासकीय अनुदान की सुविधा अनुमन्य है। मत्स्य पालक निजी क्षेत्रों में स्थापित छोटे आकार की हैचरियों से भी शुद्ध बीज प्राप्त कर सकते हैं। मत्स्य बीज संचय व अंगुलिकाओं की देखभालतालाब में ऐसी मत्स्य प्रजातियों का पालन किया जाना चाहिए जो एक पर्यावरण में साथ-साथ रह कर एक दूसरे को क्षति न पहुंचाते हुए प्रत्येक सतह पर उपलब्ध भोजन का उपयोग करते हुए तीव्रगति से बढ़ने वाली हों ताकि एक सीमित जलक्षेत्र से अधिक से अधिक मत्स्य उत्पादन सुनिश्चित हो सके। भारतीय मेजर कार्प मछलियों में कतला, रोहू, नैन तथा विदेशी कार्प मछलियों में सिल्वर कार्प, ग्रास कार्प व कामन कार्प का मिश्रित पालन काफी लाभकारी होता है। तालाब में मत्स्य बीज संचय से पूर्व यह विशेष ध्यान देने योग्य है कि तैयारी पूर्ण हो गयी है और जैविक उत्पादन हो चुका है। मछली का प्राकृतिक भोजन जिसे प्लांक्टान कहते हैं पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध होना चाहिए। तालाब के 50 लीटर पानी में एक मि०ली० प्लांक्टान की उपलब्धता इस बात का द्योतक है कि मत्स्य बीज संचय किया जा सकता है। एक हे० जल क्षेत्र में 50 मि०मी० आकार से कम का 10,000 मत्स्य बीज तथा 50 मि०मी० से अधिक आकार की 5000 अंगुलिकाएं संचित की जानी चाहिए। यदि छह प्रकार की देशी व विदेशी कार्प मछलियों का मिश्रित पालन किया जा रहा हो तो कतला 20 प्रतिशत सिल्वर कार्प 10 प्रतिशत, रोहू 30 प्रतिशत, ग्रास कार्प 10 प्रतिशत, नैन 15 प्रतिशत व कामन कार्प 15 प्रतिशत का अनुपात उपयुक्त होता है। यदि सिल्वर कार्प व ग्रास कार्प मछलियों का पालन नहीं किया जा रहा है और 4 प्रकार की मछलियां पाली जा रही हैं तो संचय अनुपात कतला 40 प्रतिशत, रोहू 30 प्रतिशत, नैन 15 प्रतिशत व कामन कार्प 15 प्रतिशत होना लाभकारी होता है। यदि केवल भारतीय मेजर कार्प मछलियों का ही पालन किया जा रहा हो तो कतला 40 प्रतिशत, रोहू 30 प्रतिशत, नैन 30 प्रतिशत का अनुपात होना चाहिए। कामन कार्प मछली का बीज मार्च, अप्रैल व मई में तथा अन्य कार्प मछलियों का बीज जुलाई, अगस्त, सितम्बर में प्राप्त किया जा सकता है। मृदा एवं जल का विस्तृत विवरणमछली की अधिक पैदावार के लिए तालाब की मिट्टी व पानी का उपयुक्त होना परम आवश्यक है। ऐसी मिट्टी जिसमें सैण्ड 40 प्रतिशत तक, सिल्ट 30 प्रतिशत तथा क्ले 30 प्रतिशत हो एवं पी-एच 6.5 से 7.5 हो, मत्स्य पालन हेतु तालाब निर्माण के लिए उपयुक्त होती है। मिट्टी में सैण्ड का प्रतिशत अधिक होने पर तालाब में पानी रूकने की समस्या होती है। अधिक क्षारीय मृदा भी मत्स्य पालन हेतु उपयुक्त नहीं होती है। तालाब की मिट्टी में 50 मि०ग्रा० नाइट्रोजन तथा 6 मि०ग्रा० फास्फोरस प्रति 100 ग्राम मिट्टी एवं एक प्रतिशत आर्गेनिक कार्बन होना चाहिए। यदि उपलब्ध नाइट्रोजन, फास्फोरस एवं आर्गेनिक कार्बन सामान्य से कम है तो निर्धारित मात्राओं में जैविक व रसायनिक उर्वरकों का प्रयोग करते हुए तालाब को मत्स्य पालन हेतु उपयुक्त बनाया जा सकता है। तालाब के जल का रंग हल्का भूरा होना उपयुक्त होता है क्योंकि इस प्रकार के जल में मछली का प्राकृतिक भोजन प्लांक्टान उपलब्ध होता है। पानी हल्का क्षारीय होना उपयुक्त होता है। पानी की पी-एच 7.5 से 8.5 घुलित आक्सीजन 5 मि०ग्रा० प्रति लीटर, स्वतंत्र कार्बन डाइआक्साइड 0 से 0.5 मि०ग्रा० प्रति लीटर, सम्पूर्ण क्षरीयता 150-250 मि०ग्रा० प्रति लीटर, क्लोराइड्स 30-50 मि०ग्रा० प्रति लीटर तथा कुल कठोरता 100-180 मि०ग्रा० प्रति लीटर तक होनी चाहिए। मत्स्य पालकों के तालाबों की मिट्टी-पानी का नि:शुल्क परीक्षण मत्स्य विभाग की प्रयोगशालाओं द्वारा किया जाता है तथा वैज्ञानिक विधि से मत्स्य पाल करने हेतु तकनीकी सलाह दी जाती है। वर्तमान में मत्स्य विभाग की 12 प्रयोगशालायें कार्यरत हैं। केन्द्रीय प्रयोगशाला मत्स्य निदेशालय 7-फैजाबाद रोड, लखनऊ में स्थित है। शेष 11 प्रयोगशालायें फैजाबाद, गोरखपुर, वाराणसी, आजमगढ़, मिर्जापुर, इलाहाबाद, झाँसी, आगरा, बरेली, मेरठ मण्डलों में उप निदेशक मत्स्य के अन्तर्गत तथा जौनपुर जनपद में गूजरताल मत्स्य प्रक्षेत्र पर कार्यशील है। == मत्स्य रोग, लक्षण एवं उनका निदान == सैपरोलगनियोसिस लक्षण :- शरीर पर रूई के गोल की भांति सफेदी लिए भूरे रंग के गुच्छे उग जाते हैं। उपचार -3 प्रतिशत साधारण नमक घोल या कॉपर सल्फेट के 1:2000 सान्द्रता वाले घोल में 1:1000 पोटेशियम के घोल में 1-5 मिनट तक डुबाना छोटे तालाबों को एक ग्राम मैलाकाइट ग्रीन को 5-10 मी० पानी की दर प्रभावकारी है। बैंकियोमाइकोसिस लक्षण :- गलफड़ों का सड़ना, दम घुटने के कारण रोगग्रस्त मछली ऊपरी सतह पर हवा पीने का प्रयत्न करती है। बार-बार मुंह खोलती और बंद करती है। उपचार -प्रदूषण की रोकथाम, मीठे पानी से तालाब में पानी के स्तर को बढ़ाकर या 50-100 कि०ग्रा०/हे० चूने का प्रयोग या 3-5 प्रतिशत नमक के घोल में स्नान या 0.5 मीटर गहराई वाले तालाबों में 8 कि०ग्रा०/हे० की दर से कॉपर सल्फेट का प्रयोग करना। फिश तथा टेलरोग लक्षण :- आरम्भिक अवस्था में पंखों के किनारों पर सफेदी आना, बाद में पंखों तथा पूंछ का सड़ना। उपचार :- पानी की स्वच्छता फोलिक एसिड को भोजन के साथ मिलाकर इमेक्विल दवा 10 मि०ली० प्रति 100 लीटर पानी में मिलाकर रोगग्रस्त मछली को 24 घंटे के लिए घोल में एक्रिप्लेविन 1 प्रतिशत को एक हजार ली० पानी में 100 मि०ली० की दर से मिलाकर मछली को घोल में 30 मिनट तक रखना चाहिए। अल्सर लक्षण :- सिर, शरीर तथा पूंछ पर घावों का पाया जाना। उपचार :- 5 मि०ग्रा०/ली० की दर से तालाब में पोटाश का प्रयोग, चूना 600 कि०ग्रा०/हे०मी०, सीफेक्स 1 लीटर पानी में घोल बनाकर तालाब में डाले, ड्राप्सी लक्षण :- आन्तरिक अंगो तथा उदर में पानी का जमाव उपचार :- मछलियों को स्वच्छ जल व भोजन की उचित व्यवस्था, चूना 100 कि०ग्रा०/हे० की दर से 15 दिन के उपरान्त प्रोटोजोन रोग "कोस्टिएसिस" लक्षण :- शरीर एवं गलफड़ों पर छोटे-छोटे धब्बेदार विकार उपचार :- 50 पी०पी०एम० फोर्मीलिन के घोल में 10 मिनट या 1:500 ग्लेशियल एसिटिक एसिड के घोल में 10 मिनट कतला का नेत्र रोग लक्षण :- नेत्रों में कॉरनिया का लाल होना प्रथम लक्षण, अन्त में आंखों का गिर जाना, गलफड़ों का फीका रंग इत्यादि उपचार :- पोटाश 2-3 पी०पी०एम०, टेरामाइसिन को भोजन 70-80 मि०ग्रा० प्रतिकिलो मछली के भार के, स्टेप्टोमाईसिन 25 मि०ग्रा० प्रति कि०ग्रा० वजन के अनुसार इन्जेक्शन का प्रयोग इकथियोपथिरिऑसिस लक्षण :- अधिक श्लेष्मा का स्त्राव, शरीर पर छोटे-छोटे अनेक सफेद दाने दिखाई देना उपचार :- 7-10 दिनों तक हर दिन, 200 पी०पी०एम० फारगीलन के घोल का प्रयोग स्नान घंटे, 7 दिनों से अधिक दिनों तक 2 प्रतिशत साधारण घोल का प्रयोग, ट्राइकोडिनिओसिस तथा शाइफिडिऑसिस लक्षण :- श्वसन में कठिनाई, बेचैन होकर तालाब के किनारे शरीर को रगड़ना, त्वचा तथा गलफड़ों पर अत्याधिक श्लेष स्त्राव, शरीर के ऊपर उपचार :- 2-3 प्रतिशत साधारण नमक के घोल में, 10 पी०पी०एम० कापर सल्फेट घोल का प्रयोग, 20-25 पी०पी०एम० फार्मोलिन का प्रयोग मिक्सोस्पोरोडिऑसिस लक्षण :- त्वचा, मोनपक्ष, गलफड़ा और अपरकुलम पर सरसों के दाने उपचार :- 0.1 पी०पी०एम० फार्मोलिन में, 50 पी०पी०एम० फार्मोलिन में 1-2 बराबर सफेद कोष्ट मिनट डुबोए, तालाब में 15-25 पी०पी०एम० फार्मानिल हर दूसरे दिन, रोग समाप्त होने तक उपयोग करें, अधिक रोगी मछली को मार देना चाहिए तथा मछली को दूसरे तालाब में स्थानान्तरित कर देना चाहिए। कोसटिओसिस लक्षण :- अत्याधिक श्लेषा, स्त्राव, श्वसन में कठिनाई और उत्तेजना उपचार :- 2-3 प्रतिशत साधारण नमक 50 पी०पी०एम० फार्मोलिन के घोल में 5-10 मिनट तक या 1:500 ग्लेशियस एसिटिक अम्ल के घोल में स्नान देना डेक्टायलोगारोलोसिस तथा गायरडैक्टायलोसिक लक्षण :- प्रकोप गलफड़ों तथा त्वचा पर होता है तथा शरीर में काले रंग के कोष्ट उपचार :- 500 पी०पी०एम० पोटाश ओ के घोल में 5 मिनट बारी-बारी से 1:2000, एसिटिक अम्ल तथा सोडियम क्लोराइड 2 प्रतिशत के घोल में स्नान देना। डिपलोस्टोमियेसिस या ब्लैक स्पाट रोग लक्षण :- शरीर पर काले धब्बे उपचार :- परजीवी के जीवन चक्र को तोड़ना चाहिए। घोंघों या पक्षियों से रोक लिगुलेसिस लक्षण :- कृमियों के जमाव के कारण उदर फूल जाता है। उपचार :- परजीवी के जीवन चक्र को तोड़ना चाहिए इसके लिए जीवन चक्र से जुड़े जीवों घोंघे या पक्षियों का तालाब में प्रवेश वर्जित, 10 मिनट तक 1:500 फाइमलीन घोल में डुबोना, 1-3 प्रतिशत नमक के घोल का प्रयोग। आरगुलेसिस लक्षण :- कमजोर विकृत रूप, शरीर पर लाल छोटे-छोटे ध्ब्बे इत्यादि उपचार :- 24 घण्टों तक तालाब का पानी निष्कासित करने के पश्चात 0.1-0.2 ग्रा०/लीटर की दर से चूने का छिड़काव गौमोक्सिन पखवाड़े में दो से तीन बार प्रयोग करना उत्तम है। 35 एम०एल० साइपरमेथिन दवा 100 लीटर पानी में घोलकर 1 हे० की दर से तालाब में 5-5 दिन के अन्तर में तीन बार प्रयोग करे लरनिएसिस मत्स्य लक्षण :- मछलियों में रक्तवाहिनता, कमजोरी तथा शरीर पर धब्बे उपचार :- हल्का रोग संक्रमण होने से 1 पी०पी०एम० गैमेक्सीन का प्रयोग या तालाब में ब्रोमोस 50 को 0.12 पी०पी०एम० की दर से उपयोग अन्य बीमारियां ई०यू०एस० अल्सरेटिव सिन्ड्रोम लक्षण :- प्रारम्भिक अवस्था में लाल दागमछली के शरीर पर पाये जाते हैं जो धीरे-धीरे गहरे होकर सड़ने लगते हैं। मछलियों के पेट सिर तथा पूंछ पर भी अल्सर पाए जाते हैं। अन्त में मछली की मृत्यु हो जाती है। उपचार :- 600 कि०ग्रा० चूना प्रति हे० प्रभावकारी उपचार। सीफेक्स 1 लीटर प्रति हेक्टेयर भी प्रभावकारी है। == पूरक आहार == मछली की अधिक पैदावार के लिए यह आवश्यक है कि पूरक आहार दिया जाय। आहार ऐसा होना चाहिए जो कि प्राकृतिक आहार की भांति पोषक तत्वों से परिपूर्ण हो। साधारणत: प्रोटीनयुक्त कम खर्चीले पूरक आहारों का उपयोग किया जाना चाहिए। मूंगफली, सरसों, नारियल या तिल की महीन पिसी हुई खली और चावल का कना या गेहूं का चोकर बराबर मात्रा में मिलाकर मछलियों के कुल भार का 1-2 प्रतिशत तक प्रतिदिन दिया जाना चाहिए। मछलियों के औसत वजन का अनुमान 15-15 दिन बाद जाल चलवाकर कुछ मछलियों को तौलकर किया जा सकता है। यदि ग्रास कार्प मछली का पालन किया जा रहा हो तो जलीय वनस्पति जैसे लेमना, हाइड्रिला, नाजाज, सिरेटोफाइलम आदि व स्थलीय वनस्पति जैसे नैपियर, वरसीम व मक्का के पत्ते इत्यादि जितना भी वह खा सके, प्रतिदिन देना चाहिए। पूरक आहार निश्चित समय व स्थान पर दिया जाय तथा जब पहले दिया गया आहार मछलियों द्वारा खा लिया गया हो तब पुन: पूरक आहार दें। उपयोग के अनुसार मात्रा घटाई-बढ़ाई जा सकती है। पूरक आहार बांस द्वारा लटकाये गये थालों या ट्रे में रखकर दिया जा सकता है। यदि पूरक आहार के प्रयोग स्वरूप पानी की सतह पर काई की परत उत्पन्न हो जाय तो आहार का प्रयोग कुछ समय के लिए रोक देना चाहिए क्योंकि तालाब के पानी में घुलित आक्सीजन में कमी व मछलियों के मरने की सम्भावना हो सकती है। == बाहरी कड़ियां == मत्स्यिकी शन्दावली मछली के आम रोग कारण, लक्षण, तर्क कार्यवाही, इलाज मत्स्य उद्योग से कैरियर व रोजगार की असीम संभावनाएँ मत्स्य पालन एवं जलकृषि वैज्ञानिक दृष्टिकोण पालने योग्य मछलियाँ, उनकी पहचान तथा विशेषतायें मछलियों की विभिन्न प्रजातियों के बारे में जानकारी मत्स्य पालन तकनीक मत्स्यपालन प्रश्नावली उत्तर प्रदेश मत्स्य पालन विभाग की आधिकारिक वेबसाइट हिमाचल प्रदेश का मत्स्य विभाग NOAA Aquaculture Website FAO Fisheries Department and its SOFIA report on fisheries and aquaculture Aquaculture Network Information Center Brown, Lester R Fish Farming May Soon Overtake Cattle Ranching As a Food Source Earth Policy Institute. Wikipedia

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  Acquariofilia

L'acquariofilia è un hobby che consiste nell'allevare pesci, invertebrati e piante acquatiche in un acquario casalingo o in un laghetto da giardino. Wikipedia

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養魚(ようぎょ)は、広義では「魚を飼育してふやすこと」を意味するが、ここで取り上げる「養魚」は、古代中国から伝わる、伝統的かつ合理的な魚(主に淡水魚)の養殖法のことをいう。 Wikipedia

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  Аквариумистика · Аквариумист

Аквариуми́стика — род занятий, связанный с моделированием экосистемы в замкнутом искусственном водоёме. Wikipedia

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  Acuariofilia · Acuarismo

La acuariofilia moderna es la afición a la cría de peces y otros organismos acuáticos en acuario, bajo condiciones controladas.[1]​ Ha evolucionado tremendamente a lo largo de los siglos, desde el mantenimiento de carpas doradas con fines ornamentales en recipientes y estanques, desde hace 2000 años. Wikipedia


 

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水族饲养, 养鱼, fishkeeping, 水 族
fishkeeping, Aquarism, Aquarist, Aquaristic, Aquaristics, Aquarists, Aquarium Keeping, Aquarium trade, Aquariumist, Fish-keeper, Fish-keepers, Fish-keeping, Fish as pets, Fish keeper, Fish keepers, Fish keeping, Fishkeeper, Fishkeepers, Pet fish, Swordtail Breeding
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גידול דגי נוי, דגי נוי, aquarist, fishkeeping, האקווריומיסטים
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аквариумистика, аквариумист, акваристики, аквариумистов
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